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समाज

समाज मनुष्य की सोच से बने हुए महल की नीव है यह नीव हमे कैसी बनानी है जो हमारे सकारात्मक और नकारात्मक विचारों पर निर्भर करता है | हमारे नजरिये से तो
"अपने विचारों को देखो शब्द बन जायेंगे,
अपने शब्दों को देखो कर्म बन जायेंगे,
अपने कर्मों को देखो आदत बन जायेंगे,
अपनी आदतों को देखो नियति बन जायेगी."
जैसा की हम सब जानते हैं की हमारी नियति हमारी सोच और हमारे समाज पर निर्भर करती है |स्वामी विवेकानंदजी ने कहा है कि "समाज की नीवं तीन शब्दों पर टिकी है उपहास , विरोध और अनुमति." ये तीनों शब्द बहुत ही अनुभवी हैं कोई भी कार्य करने से पहले समाज मनुष्य का उपहास करेगा उसे उसके रास्ते से भटकाने के लिए और बाद में उसका विरोध करेगा अगर मनुष्य उपहास और विरोध को सहन कर के आगे निकल गया और अपने रास्ते पर अपना कर्म करता रहा तो बाद में यही समाज जो कभी उसका उपहास करता था या उसका विरोध करता था अपनी अनुमति देता है और साथ भी देगा | इसलिए समाज में धेर्य रखकर ही जीना चाहिए| हमारे परिवार द्वारा दिए गए संस्कार कभी कमजोर नहीं पड़ने चाहिए क्योंकि परिवार समाज का छोटा रूप होता है और समाज राष्ट्र का | इसीलिए एक राष्ट्र बनाने के लिए समाज का बनाना बहुत जरुरी है |
मंगल पांडे ने कहा था की क्रांति का कोई समय नहीं होता यह कभी भी कहीं भी और किसी भी वक्त शुरू की जा सकती है |
अंत मैं बस यही कहूँगा की मेरे देश के शेरो तुम सो क्यों रहे हो जागो और इन गीदड रूपी समाज की बुराईयों को समाप्त कर दो |

"समाज है आराध्य हमारा - सेवा है आराधना , भारत माँ के सुख वैभव की -सेवा व्रत से कामना "
>>>जय हिंद -जय भारत <<<

written by.....
Sumit Kumar
  

 
 
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